आपसी सहमति से तलाक और अनुच्छेद 142

आपसी सहमति से तलाक और अनुच्छेद 142

आपसी सहमति से तलाक और अनुच्छेद 142

संदर्भ- सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की पीठ ने निर्णय दिया कि अदालत संविधान के अनुच्छेद 142 का प्रयोग कर तलाक को मंजूरी दे सकती है। यदि विवाह बिना किसी पारिवारिक अदालत के पहले पक्षों को संदर्भित किए बिना टूट जाता है, तो उस परिस्थिति में यह निर्णय प्रभावी हो सकता है।

इसके साथ ही सामान्य तौर पर विवाह के असाध्यता के आधार पर तलाक की स्थिति में कोई भी पक्ष अनुच्छेद 32 के आधार पर विघटन में राहत की मांग के लिए रिट जारी नहीं कर सकता।   

आपसी सहमति से तलाक 

वह परिस्थिति जब पति पत्नी दोनों इस तथ्य से सहमत होते हैं कि वे एक साथ नहीं रह सकते और दोनों के भविष्य के लिए तलाक ही एकमात्र विकल्प है। इसके तहत वे एक दूसरे पर कोई भी आरोप लगाए बिना तलाक के लिए याचिका दायर कर सकते हैं।

कानूनी प्रावधान 

विवाह को भंग करने की शक्ति – न्यायालय के शिल्पा शैलेश बनाम वरुण श्रीनिवासन केस के निर्णय के अनुसार दंपति के बीच सुलह की गुंजाइश न रहने की स्थिति में न्यायालय के पास विवाह को भंग करने की शक्ति प्राप्त हैं।

हिंदू विवाह अधिनियम 1955- सामान्यतः तलाक की याचिका के बाद न्यायालय द्वारा याचकों को 6 माह की अवधि का समय दिया जाता है कि यदि विवाह को बनाए रखने की गुंजाइश हो तो तलाक को रोका जा सके। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के अनुसार यदि एक पक्ष भी तलाक के पक्ष में हो और सुलह की कोई गुंजाइश न हो तो न्यायालय विवाह को भग करने की अनुमति दे सकता है। 

तलाक की सामान्य प्रक्रिया

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(b) के अनुसार न्यायालय आपसी सहमति के तलाक को मंजूरी देने से पूर्व निम्न प्रक्रिया का पालन करती है-

  • आपसी सहमति से तलाक लेने के लिए दंपति को एक साथ जिला अदालत में याचिका दायर करनी होती है कि वे एक वर्ष से अधिक समय से एक साथ नहीं रह रहे, और आगे भी एक साथ नहीं रह सकते। इस तथ्य से दोनों पक्ष सहमत है कि उन्हें विवाह विच्छेद कर लेना चाहिए। 
  • याचिका की प्रस्तुति के बाद याचिकाकर्ताओं को अदालत में दूसरी तारीख 6 माह के बाद या उक्त तारीख के 18 माह बाद दी जाती है। इसका उद्देश्य याचिकाकर्ताओं को आत्मनिरीक्षण करने व निर्णय पर फिर से विचार करने का समय देना होता है। इस अवधि(6 माह) को कूलिंग ऑफ पीरियड भी कहा जाता है। 
  • 6 माह के बाद भी यदि याचिका वापस न ली जाए और अदालत को विश्वास हो कि याचिका में दिए गए सभी तथ्य सत्य हैं तो वह याचिका को मंजूरी दे सकता है। अर्थात न्यायालय तलाक को सत्यापित कर सकता है। 

तलाक से पूर्व न्यायालय निम्न तथ्यों की जांच करता है-

  • विवाह के बाद का समय, जिसमें दंपति साथ रह रहे हों।
  • साथ न रहने की समयावधि।
  • याचिकाकर्ताओं द्वारा एक दूसरे के परिवारों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की प्रकृति
  • व्यक्तिगत संबंधों पर प्रभाव
  • कानूनी कार्यवाही में पारित आदेश।
  • न्यायालय द्वारा विवादों को सुलझाने हेतु किए गए प्रयासों की संख्या और प्रकृति । 

संविधान का अनुच्छेद 142

अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को विवेकाधीन निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है। इसके तहत –

  • संविधान सुप्रीम कोर्ट ऐसी डिक्री प्रदान करता है जिसके द्वारा सुप्रीम कोर्ट किसी भी लंबित मामले में पूर्ण न्याय हेतु निर्णय दे सकता है। 
  • यह निर्णय उन मामलों में दिया जा सकता है जहां संविधान में कोई भी प्रावधान नहीं दिया गया है।  

वर्तमान निर्णय की समीक्षा

वर्तमान निर्णय का प्रत्यक्ष प्रभाव अदालती कार्यवाहियों की लंबी प्रक्रिया की अवधि में कमी लाएगा। इसके साथ ही अदालतों में वर्षों से लंबिक मामलों का जल्द निपटान किया जा सकेगा। 

विवाह से संबंधित मामलों सहित अन्य कानूनी मामलों का निपटान जल्द से जल्द हो सकेगा, जिससे अदालतों के बार में कमी आएगी। 

तलाक की याचिका देने के बाद अदालत के संतुष्ट होने के बाद तलाक में राहत के लिए रिट याचिका दायर नहीं की जा सकेगी, अतः यदि यदि दोनों में से कोई भी पक्ष यदि संबंध विच्छेद की प्रक्रिया को रोकना चाहता है तो वह इसके लिए आवेदन नहीं कर सकता। अर्थात इस निर्णय से विवाह विच्छेद की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

कूलिंग ऑफ पीरियड की अनिवार्यता समाप्त हो जाएगी, जिन मामलों में कूलिंग ऑफ पीरियड से विवाह विच्छेद के मामले कम होने की संभावना हो सकती है, वह समाप्त हो जाएगी। इसके साथ ही जिन मामलों में विवाद समाप्त होने की कोई गुंजाइश न हो उन मामलों का निपटान जल्दी हो सकेगा।

आपसी सहमति से तलाक का निपटान जल्द होने से प्रक्रिया के कारण मानसिक तनाव, आर्थिक खर्च और समय को कम करता है।

स्रोत

Indian Express

 

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