जल्लीकट्टू: सुप्रीम कोर्ट का फैसला

जल्लीकट्टू: सुप्रीम कोर्ट का फैसला

संदर्भ-

  • सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय पशु क्रूरता अधिनियम में तमिलनाडु सरकार की ओर से किए गए संशोधन की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है।
  • जल्लीकट्टू के पीछे की सांस्कृतिक भावना को बरकरार रखते हुए उच्चतम न्यायलय ने कहा की यह खेल सदियों से तमिलनाडु की संस्कृति का हिस्सा है जिसे बाधित नहीं किया जा सकता।

प्रमुख बिन्दु-

जल्लीकट्टू के बारे में-

  • जल्लीकट्टू ‘मट्टू पोंगल’ के दिन आयोजित किया जाने वाला एक परंपरागत खेल है जिसमें बैलों को इंसानों द्वारा नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है।
  • यह मदुरै, तिरुचिरापल्ली, थेनी, पुदुक्कोट्टई और डिंडीगुल जिलों में लोकप्रिय है, जिन्हें जल्लीकट्टू बेल्ट के रूप में जाना जाता है।
  • मट्टू पोंगल तमिलनाडू में चार दिन तक चलने वाले त्योहार पोंगल के तीसरे दिन मनाया जाता है।
  • यह त्यौहार प्रकृति का उत्सव है, पारम्परिक रूप से ये सम्पन्नता को समर्पित त्यौहार है जिसमें समृद्धि लाने के लिए वर्षा, धूप तथा खेतिहर मवेशियों की आराधना की जाती है।

नामकरण-

  • प्राचीन तमिल संगम में “जल्लीकट्टू” को “एरूथाजहूवुथल” नाम से वर्णित किया गया है जिसका अर्थ “सांड को गले लगाना” है|
  • तमिल भाषाविदों के अनुसार “जल्ली” शब्द दरअसल “सल्ली” से बना है जिसका अर्थ “सिक्का” और कट्टू का अर्थ “बांधा हुआ” है|
  • साथ ही इसे “मंजू विराट्टू” नाम से भी वर्णित किया गया है जिसका अर्थ “सांड का पीछा करना” है|
  • जल्लीकट्टू को येरुथा ज़ुवुथल, मदु पिदिथल, पोलरुधु पिदिथल जैसे अन्य नामों से भी जाना जाता है।

जल्लीकट्टू का इतिहास-

  • ऐसा माना जाता है कि जल्लीकट्टू तमिल शास्त्रीय युग (400-100 ईसा पूर्व) से संबंधित एक प्राचीन खेल है। यह खेल प्राचीन “अय्यर” लोग जो प्राचीन तमिल प्रदेश की “मुल्लै” नामक भाग में रहते थे, के बीच काफी प्रचलित था|
  • इसका वर्णन प्रसिद्ध तमिल महाकाव्य शिलप्पदिकारम और दो अन्य ग्रन्थों मालीपादुकादम और कालीथोगई में भी मिलता है। इसके अलावा, एक 2500 साल पुरानी गुफा पेंटिंग में एक बैल को नियंत्रित करने वाले एक आदमी को दर्शाया गया है जिसे इसी खेल से जोड़ा जाता है।

तमिल संस्कृति में जल्लीकट्टू का महत्त्व-

  • ऐसे समय में जब ‘पशु प्रजनन’ अक्सर एक कृत्रिम प्रक्रिया होती है, जल्लीकट्टू को किसान समुदाय द्वारा अपनेशुद्ध नस्ल के देशी बैलों को संरक्षित करने का एक पारंपरिक तरीका माना जाता है।
  • संरक्षणवादियों और किसानों का तर्क है कि जल्लीकट्टू उन नर जानवरों की रक्षा करने का एक तरीका है, जिनका उपयोग जुताई में न होने पर केवल माँग के लिये किया जाता है।
  • जल्लीकट्टू के लिये उपयोग की जाने वाली लोकप्रिय देशी मवेशियों की नस्लों में‘कंगयम, पुलिकुलम, उम्बालाचेरी, बरुगुर और मलाइमाडू’ शामिल हैं।

विरोध क्या है?-

खेल के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच एक अंतहीन संघर्ष रहा है। जैसे-

  • विपक्ष में तर्क- याचिकाकर्त्ताओं का तर्क था कि जानवरों का मनुष्यों के जीवन से अटूट जुड़ाव रहा है। स्वतंत्रता “हर जीवित प्राणी में निहित है, चाहे वह जीवन के किसी भी रूप में हो,” क्योंकि यह ऐसा पहलू है जिसे संविधान द्वारा मान्यता दी गई है।
  • पक्ष में तर्क- तमिलनाडु में जल्लीकट्टू, राज्य के लोगों द्वारा मनाया जाने वालाधार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव है, जिसका प्रभाव जाति और पंथ की सीमाओं से परे है।

विरोध की पृष्ठभूमि-

  • मई 2014 में भारतीय पशु कल्याण बोर्ड बनाम ए.नागराजा मामले के फैसले में, सर्वोच्च न्यायालय ने जल्लीकट्टू पर यह कहते हुए प्रतिबंध लगा दिया कि यह एक क्रूर खेल प्रथा है जो जानवर को अनावश्यक दर्द और पीड़ा देती है।
  • विवाद की जड़ पशु क्रूरता रोकथाम (तमिलनाडु संशोधन) अधिनियम 2017 और पशु क्रूरता रोकथाम (जल्लीकट्टू का संचालन) नियम 2017 है, जिसने सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2014 के प्रतिबंध के बावजूद संस्कृति और परंपरा के नाम पर बैलों को काबू में करने वाले लोकप्रिय खेल के संचालन के लिये दरवाज़े फिर से खोल दिये थे।
  • राज्य सरकार ने बाद में अध्यादेश को प्रतिस्थापित करने के लिए एक विधेयक पारित कराया, जिसके परिणामस्वरूप यह मामला अदालत में पहुँचा और मामला फरवरी 2018 में संवैधानिक पीठ को भेज दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा फैसला-

पांच-न्यायाधीशों की खंडपीठ का फैसला दो प्रमुख निष्कर्षों पर आधारित है:

  • पहला, कोर्ट ने कहा है कि तमिलनाडु का जानवरों के साथ क्रूरता कानून (संशोधन), 2017 जानवरों को होने वाले दर्द और पीड़ा को काफी हद तक कम कर देता है। 2014 के फैसले का आधार बना।
  • दूसरा, न्यायालय ने विधायिका के इस दृष्टिकोण को स्वीकार किया है कि जल्लीकट्टू परंपरा और संस्कृति का पालन करने के लिए हर साल आयोजित किया जाने वाला खेल है।

भारत में पशु अधिकारों की रक्षा करने वाले संवैधानिक प्रावधान

अनुच्छेद 21: संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत, ‘जीवन’ शब्द का विस्तार किया गया है ताकि इसमें पशु जीवन सहित जीवन के सभी रूपों को शामिल किया जा सके जो मानव जीवन के लिए आवश्यक है। इसके अलावा, सम्मान का अधिकार और उचित उपचार भी पशु अधिकारों के लिए महत्वपूर्ण है

अनुच्छेद 29  (1): भारत में रहने वाले नागरिकों के किसी भी वर्ग की संस्कृति, भाषा और लिपि को संरक्षण का अधिकार प्रदान करता है, जिनकी एक विशिष्ट संस्कृति, भाषा या लिपि है।

अनुच्छेद 48:- भारतीय संविधान के भाग-IV के तहत राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों (DPSP) का एक हिस्सा है। राज्य को गायों और बछड़ों और अन्य दुधारू पशुओं के वध पर प्रतिबंध लगाने के लिए प्रयास करने का निर्देश देता है और राज्य से कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक आधार पर संगठित करने का प्रयास करने का भी आग्रह करता है।

अनुच्छेद 51A(g): प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करे और उसका संवर्धन करे तथा प्राणि मात्र के प्रति दयाभाव रखे

स्त्रोत- द हिन्दू-

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