दक्षिण भारत के पठार

दक्षिण भारत के पठार

संदर्भ- पुणे में आघरकर रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों को पश्चिमी घाट में एक कम ऊँचाई वाला एक बेसाल्ट पठार प्राप्त हुआ है। जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से पौंधों की प्रजातियों के संरक्षण के लिए शोध किया जा सकता है। 

पश्चिमी घाट के अब तक ज्ञात पठारों में उच्च अथवा निम्न ऊँचाई के लैटेराइट युक्त पठार, बेसाल्ट युक्त पठार उच्च ऊँचाई के प्राप्त हुए हैं। वर्तमान में प्राप्त बेसाल्ट पठार नवनिर्मित व कम ऊँचाई वाला है। 

पठार- पठार पृथ्वी में उपस्थित विभिन्न स्थलरूपोंमें से एक है, जो आसपास की भूमि से थोड़ा ऊपर उठा हुआ होता है। किंतु यह पर्वत या पहाड़ भी नहीं होता क्योंकि इसका ऊपरी भाग सपाट होता है। पठार पुराने अथवा नवनिर्मित हो सकते हैं। जैसे भारत के पुराने पठारों में दक्कन का पठार और नवनिर्मित पठारों में पुणे का बेसाल्ट पठार आदि हैं। वैश्विक स्तर पर पृथ्वी का लगभग 18%भाग पठार कवर करते हैं। 

पठारों के प्रकार

भौगोलिक स्थिति व संरचना के आधार पर पठारों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है।

  1. अंतरा पर्वतीय पठार
  2. गिरिपद पठार 
  3. महाद्वीपीय पठार 

अंतरा पर्वतीय पठार को चारों ओर से ऊँची पर्वत श्रृंखलाएं घेरे रहती हैं। इसी प्रकार के पठार सबसे ऊँचे पाए जाते हैं। इनकी औसत ऊँचाई लगभग 3000 मीटर होती है। उदाहरण के लिए तिब्बत का पठार जो 4500 मीटर की ऊँचाई पर है। जो वलित पर्वतों( हिमालय, कराकोरम, क्यूनलुन, तियनशान) से घिरा है।

गिरिपद पठार- इन्हें पीडमोंट पठार भी कहते हैं। यह पठार एक ओर पर्वत से तथा दूसरी ओर मैंदान या समुद्र से जुड़े होते हैं। यह पठार कठोर शैलों से निर्मित होते हैं। क्योंकि इनका अपरदन होते रहता है इसलिए इन्हें अपरदन पठार भी कहा जाता है। जिसके कारण इन पठारों की ऊँचाई कम हो जाती है। इन पठारों में भारत का मालवा पठार, दक्षिण अमेरिका का पैडगोनिया पठार आदि हैं।

महाद्वीपीय पठार – धरातल के किसी भाग का लावा की परतों के कारण ऊपर उठने से महाद्वीपीय पठार का निर्माण होता है। इन पठारों में भारत में महाराष्ट्र का लावा का पठार, संयुक्त राज्य अमेरिका में स्नेक नदी पठार शामिल हैं।

पठारों का महत्व

  • खनिजों के भण्डार- पठार खनिजों के भण्डार होते हैं, भारत में खनिजों के भण्डार, छोटे नागपुर के पठार में पाए जाते हैं जिसमें लोहा, कोयला, मैंगनीज पाए जाते हैं।
  • जल विद्युत उत्पादन- पठारों के ढालों पर नदियाँ जल प्रपात बनाती हैं,ये जल प्रपात विद्युत उत्पादन के लिए उपयुक्त स्थल होते हैं। भारत में यह छोटा नागपुर पठार के हुंडरु जल प्रपात, कर्नाटक में जोग जलप्रपात आदि हैं।
  • ठण्डी जलवायु- यह क्षेत्र ठण्डी जलवायु के कारण पर्यटन स्थल बन सकते हैं।
  • कृषि के लिए उपयोगी- लावा पठारों में काली मिट्टी की प्रचुरता पाई जाती है जो कृषि के लिए उपजाउ होती है
  • पशु चारण के लिए उपयोग- पठार क्षेत्र पशुचारण के लिए उपयोगी होते हैं। जो पशुपालन में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।
  • जैव विविधता- पठार विभिन्न जीवों का आवास होने के साथ मानसून में विभिन्न पौंधों की प्रजातियों के लिए अनुकूल अवस्था उत्पन्न करते हैं। नए पठार की खोज वर्ष के अन्य महीनों में भी पौंधों को पठारों में जीवित रखने के तरीके खोजने में मदद करेगी।

दक्षिण भारत के पठार

भारत के पश्चिमी तट की पर्वत श्रृंखलाओं को पश्चिमी घाट कहते है, जो गुजरात, महाराष्ट्र, गोआ, तमिलनाडु, व केरल राज्यों में स्थित हैं। इनसे संलग्न निम्न पठार में पाए जाते हैं।

  • दकन का पठार- भारत का सबसे विशाल पठार है, पूर्वी घाट व पश्चिमी घाट दकन के पठार की सीमा है। पठार लैटेराइट मिट्टी से बना हुआ है।  और महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना व केरल राज्यों में विस्तृत हैं। 
  • कर्नाटक का पठार – यह पठार कर्नाटक राज्य में स्थित व ज्वालामुखी चट्टानों से मिलकर है, इसे काली मिट्टी की भूमि भी कहा जाता है। यह ज्वार, कपास, गन्ना, कॉफी, तिल मूंगफली आदि की खेती के लिए उपयुक्त स्थल है। इसका जोग जलप्रपात, पनबिजली का एक प्रमुख स्रोत है। यहां मैंगनीज, तांबा, क्रोमियम व बॉक्साइड आदि खनिज पाए जाते हैं।
  • तेलंगाना का पठार- कृष्णा नदी बेसिन के दक्षिण में तेलंगाना का पठार स्थित है। इस पठार का दक्षिणी क्षेत्र उपजाउ तथा उत्तरी स्थल पठारी है।

इण्डियन एक्सप्रैस

https://nios.ac.in/media/documents/316coursee/hg-7f.pdf

https://nios.ac.in/media/documents/316coursee/hg-7f.pdf

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