बाल अश्लीलता : एक संगीन अपराध

बाल अश्लीलता : एक संगीन अपराध

स्त्रोत – द हिन्दू एवं पीआईबी।

सामान्य अध्ययन – राष्ट्रीय अपराध रिपोर्ट ब्यूरो (NCRB), यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012, बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM), किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2021, बाल दुर्व्यवहार, बाल अश्लीलता।

खबरों में क्यों ? 

  • हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय ने एस. हरीश बनाम पुलिस निरीक्षक मामले में न्यायिक कार्यवाही को रद्द कर दिया और माना कि बाल पोर्नोग्राफी डाउनलोड करना सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम, 2000 की धारा 67 B के तहत अपराध नहीं था। 
  • मद्रास उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि बाल पोर्नोग्राफ़ी देखना अपने आप में कोई अपराध नहीं था क्योंकि आरोपी ने इसे केवल अपने इलेक्ट्रॉनिक गैजेट पर डाउनलोड किया था और निजी तौर पर देखा था।
  • मद्रास उच्च न्यायालय ने केरल उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए एक निर्णय का भी उल्लेख किया जहां यह माना गया था कि निजी स्थान पर अश्लील साहित्य देखना भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 292 के तहत अपराध नहीं है। 
  • यह मामला 2016 में अलुवा पुलिस द्वारा एक युवक के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने से संबंधित है क्योंकि वह रात में सड़क के किनारे अपने मोबाइल फोन पर अश्लील सामग्री देख रहा था।
  • मद्रास उच्च न्यायालय ने माना है कि बच्चों को अकेले में अश्लील सामग्री देखना सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 के तहत अपराध नहीं है।

पोर्नोग्राफी : 

  • पोर्नोग्राफी को शॉर्ट में पॉर्न कहते हैं। इसमें ऐसे वीडियो, पत्रिकाएं, पुस्तकें या अन्य सामग्री जिनमें सेक्शुअल सामग्री होता है और जिनसे व्यक्ति की मन में सेक्स की भावना बढ़ती है,  उसे पोर्नोग्राफी कहते हैं। पॉर्न वीडियो को आम बोलचाल में ब्लू फिल्म’ भी कहते हैं।  जिन लोगों को पॉर्न या ब्लू फिल्म बोलने में हिचक होती है, वो इन्हें ‘ऐसी-वैसी’ फिल्में कहते हैं।
  • पोर्नोग्राफी (Pornography) एक ऐसी कला है, जिसमें लोगों की नंगी तस्वीरें या अश्लील वीडियो (Nude Video) दिखाई जाती हैं। यह तस्वीरें या वीडियो अक्सर सेक्स या सेक्सुअल गतिविधियों को दिखाते हुए बनाई जाती हैं। इस तरह की कला ज्यादातर व्यापक रूप से इंटरनेट पर मौजूद होती है।

बाल अश्लीलता : 

  • बाल अश्लीलता एक अपराध है जिसमें 18 साल से कम उम्र के बच्चे का यौन आग्रह या नाबालिग की भागीदारी वाली अश्लील सामग्री का निर्माण करना, बच्चों को बहला-फुसलाकर ऑनलाइन यौन संबंध बनाने के लिए तैयार करना, फिर उनके साथ यौन संबंध बनाना या बच्चों से जुड़ी यौन गतिविधियों को रिकार्ड करना, एमएमएस बनाना, दूसरों को भेजना आदि भी इसमें शामिल हैं। 

मद्रास उच्च न्यायालय के निर्णय की पृष्ठभूमि  :

  • एर्नाकुलम अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त को एक पत्र प्राप्त हुआ कि याचिकाकर्ता (हरीश) ने अपने मोबाइल फोन पर बच्चों वाली अश्लील सामग्री डाउनलोड की है। मामले में उस तारीख का उल्लेख नहीं है जब याचिकाकर्ता ने अश्लील सामग्री डाउनलोड की थी। 
  • पत्र प्राप्त होने पर, अलुवा पुलिस द्वारा 29 जनवरी, 2020 को आईटी अधिनियम, 2000 की धारा 67बी और POCSO अधिनियम की धारा 14(1) के तहत अपराध के लिए प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई।
  • जांच के दौरान याचिकाकर्ता का फोन फोरेंसिक साइंस विभाग को भेजा गया. इसमें बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री वाली दो फाइलों की पहचान की गई। उन दो वीडियो में यह पाया गया कि दो नाबालिग लड़के एक लड़की या वयस्क महिला के साथ यौन गतिविधि में शामिल थे।
  • POCSO अधिनियम एक बच्चे को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है जो अठारह वर्ष से कम आयु का है।
  • जांच के निष्कर्ष के बाद और पुलिस की अंतिम रिपोर्ट के आधार पर, एक जिला अदालत ने आईटी अधिनियम की धारा 67 Bऔर POCSO अधिनियम की धारा 14(1) के तहत इन अपराधों का स्वतः संज्ञान लिया।
  • इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत कार्यवाही को रद्द करने के लिए याचिका दायर की। 
  • 4 जनवरी 2024 को याचिकाकर्ता कोर्ट के सामने पेश हुआ। जब मामला दोबारा उठाया गया तो याचिकाकर्ता ने कोर्ट के सामने स्वीकार किया कि उसे पोर्नोग्राफी देखने की आदत है। लेकिन उसने कभी भी किसी अश्लील सामग्री को प्रकाशित करने या दूसरों तक प्रसारित करने का प्रयास नहीं किया थी । याचिकाकर्ता ने केवल अश्लील सामग्री डाउनलोड की थी और उसे अकेले में गोपनीयता में देखा था।

मद्रास उच्च न्यायालय का निर्णय का निहितार्थ  : 

  • 11 जनवरी 2024 को, मद्रास उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता के फोन पर उपलब्ध अश्लील सामग्री की जांच की और पाया कि केवल दो वीडियो को बाल अश्लीलता के रूप में पहचाना जा सकता है। मद्रास उच्च न्यायालय ने  स्वीकार किया कि वीडियो न तो प्रकाशित किए गए और न ही दूसरों को प्रसारित किए गए।
  • इस आधार पर न्यायालय ने कहा कि POCSO अधिनियम की धारा 14(1) के तहत किए जाने वाले अपराध के लिएयाचिकाकर्ता केवल धारा 14 के तहत अपराध के लिए उत्तरदायी होगा यदि उसने किसी बच्चे का इस्तेमाल अश्लील उद्देश्यों के लिए किया हो।
  • इसके अतिरिक्त न्यायालय ने कहा कि बाल पोर्नोग्राफ़ी वीडियो देखना ‘सख्ती से’ POCSO की धारा 14(1) के दायरे में नहीं आता है। चूंकि याचिकाकर्ता ने किसी बच्चे या बच्चों का इस्तेमाल अश्लील उद्देश्यों के लिए नहीं किया है, इसलिए इसे केवल आरोपी व्यक्ति की ओर से नैतिक पतन के रूप में माना जा सकता है। “
  • इसके अलावा, अदालत ने माना कि आईटी अधिनियम, 2000 की धारा 67B के तहत अपराध के लिए, वीडियो सामग्री को “ प्रकाशित, प्रसारित, बनाई गई सामग्री होनी चाहिए जिसमें बच्चों को यौन कृत्य या आचरण में चित्रित किया गया हो। इस प्रावधान को ध्यान से पढ़ने से बाल पोर्नोग्राफी देखना, आईटी अधिनियम, 2000 की धारा 67 B के तहत अपराध नहीं बनता है। “
  • इसके अतिरिक्त, अदालत ने माना कि –  “धारा 67 B उस मामले को सम्मिलित नहीं करती है जहां किसी व्यक्ति ने अपने इलेक्ट्रॉनिक गैजेट में केवल बाल अश्लीलता डाउनलोड की है और उसने कुछ और किए बिना उसे देखा है। ”
  • मद्रास उच्च न्यायालय ने केरल उच्च न्यायालय के 5 सितंबर, 2023 के फैसला के आलोक में अपना निर्णय दिया कि – “दूसरों को दिखाए बिना निजी तौर पर अश्लील साहित्य देखना भारतीय दंड संहिता की धारा 292 (अश्लील पुस्तकों की बिक्री, आदि) के तहत अपराध नहीं है।” .
  • इन सभी विचारों के आधार पर, मद्रास उच्च न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्ता ने आईटी अधिनियम, 2000 की धारा 67बी और POCSO अधिनियम की धारा 14(1) के तहत कोई अपराध नहीं किया है।
  • उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता को सलाह दी है कि अगर वह अभी भी खुद को पोर्नोग्राफी देखने का आदी पाता है तो वह काउंसलिंग में शामिल हो। उच्च न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और इसलिए याचिकाकर्ता के खिलाफ सभी कार्यवाही रद्द कर दी गई।

भारत में बाल अश्लीलता की स्थिति : 

  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (National Crime Records Bureau-NCRB ) 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 में भारत में बाल अश्लीलता  के 738 मामले थे जो वर्ष 2021 में बढ़कर 969 हो गए थे। बाल अश्लीलता के मामलों की संख्या में प्रति वर्ष होने वाली बढ़ोतरी भारत में ऑनलाइन बाल यौन शोषण की भयावह स्थिति की ओर संकेत करता है, जो अत्यंत चिंताजनक है और इस पर नियंत्रण करने की सख्त जरूरत है। 

भारत में पोर्नोग्राफी से संबंधित वास्तविक स्थिति : 

  • भारत में पॉर्न बनाने, बेचने, शेयर करने, इसके प्रदर्शन आदि पर सख्त पाबंदी है।  इसके बावजूद भारत दुनिया का तीसरा सबसे अधिक पॉर्न देखने वाला देश है। 
  • वर्ष 2018 में आई एक खबर के मुताबिक, 2017 से 2018 के बीच भारत में पॉर्न देखने की दर में 75 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई थी।  भारत के छोटे शहरों में काफी अधिक संख्या में लोग इसे देख रहे हैं। 
  • 2018 में भारत सरकार ने करीब 850 पॉर्न वेबसाइटों पर बैन लगा दिया था।  ऐसा पहले भी किया गया है। लेकिन इसका कोई खास प्रभाव कभी नहीं पड़ा क्योंकि  ये वेबसाइटें नए-नए डोमेन बनाकर भारतीय बाजार में आ जाती हैं.।
  • वर्तमान समय में विभिन्न ऐप्स के जरिए, वॉट्सऐप के जरिए, टेलीग्राम के जरिए और अन्य सोशल मीडिया के जरिए यूजर इनको देख ही लेता है। 

भारत में पोर्नोग्राफी से जुड़े कानूनी प्रावधान : 

भारत में चाइल्ड पोर्नोग्राफी को अपराध के तौर पर माना जाता है और इस पर कई कानून हैं।

  • भारत में सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम 2000 भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम 2012 में पोर्नोग्राफी से जुड़े कई प्रावधान हैं।
  • भारतीय दण्ड संहिता 1860 : भारत की प्राचीनतम दण्ड संहिता में, बाल यौन उत्पीड़न और बाल अश्लीलता को अपराध के रूप में माना गया है।
  • धारा 354, 354A, 354B, 354C और 376एबी में बाल यौन उत्पीड़न और अन्य अपराधों के लिए सजा दी गई है
  • बाल अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2019 : यह अधिनियम भारत के सभी बच्चों के अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए बनाया गया है। इस अधिनियम में, बाल यौन उत्पीड़न, बाल अश्लीलता और बाल विपत्ति जैसे अपराधों के लिए कानून हैं।
  • इंफांट लेबर (प्रतिबंध) अधिनियम, 2016: यह अधिनियम बच्चों को श्रम से मुक्ति देने के लिए बनाया गया है। जो भी व्यक्ति बाल श्रम, बाल यौन उत्पीड़न और बाल अश्लीलता जैसे अपराधों में बच्चों का इस्तेमाल करते हैं, यह अधिनियम उन लोगों के खिलाफ होता है।

भारत में बाल अश्लीलता संबंधी कानून : 

  • बाल पोर्नोग्राफी पर कानून आईटी अधिनियम के साथ-साथ POCSO अधिनियम द्वारा विनियमित है।
  • POCSO अधिनियम की धारा 14 उन मामलों में लागू की जाती है जहां किसी बच्चे को अश्लील उद्देश्यों के लिए लिप्त किया जाता है  
  • POCSO अधिनियम की धारा 15 उन मामलों में लागू की जाती है जहां बाल अश्लील सामग्री सामग्री को साझा करने या प्रसारित करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में संग्रहीत की जाती है या रखी जाती है। धारा 15 की व्याख्या से पता चलता है कि बाल अश्लील सामग्री डाउनलोड करना गैरकानूनी है क्योंकि कानून के अनुसार सामग्री को हटा दिया जाना चाहिए, नष्ट कर दिया जाना चाहिए या संबंधित अधिकारियों को रिपोर्ट किया जाना चाहिए। 
  • पॉर्न का कंटेंट रेप या शारीरिक शोषण वाला है तो IT ऐक्ट, सेक्शन 67 A के तहत कार्रवाई होगी. चाइल्ड पॉर्न प्रसारित करने वाले के खिलाफ IT ऐक्ट की धारा 67 B के तहत कार्रवाई होगी. अगर कोई किसी के सेक्स करने या सेक्शुअल एक्टिविटी का वीडियो बनाता है तो ये क्राइम है. इसमें IT ऐक्ट के सेक्शन 66 E के तहत कार्रवाई होती है।.
  • IT कानून की धारा 67 A के तहत अपराध की गंभीरता को देखते हुए पहले अपराध के लिए 5 साल तक जेल की सज़ा या/और दस लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। .दूसरी बार यही अपराध करने पर जेल की सजा की अवधि बढ़कर 7 साल हो जाती है, लेकिन जुर्माना 10 लाख ही रहता है।
  • IT ऐक्ट की धारा 67 A और 67 B गैर-ज़मानती हैं। चाइल्ड पोर्नोग्राफी से जुड़े मामले में POCSO कानून के तहत भी कार्रवाई होती है।

निष्कर्ष / समाधान : 

  • भारत में बाल अश्लीलता डाउनलोड करना अपराध है।
  • बाल अश्लीलता सामग्री डाउनलोड करने के मामले में मद्रास उच्च न्यायालय के हालिया फैसले के खिलाफ भारत के उच्चतम न्यायालय में अपील की जानी चाहिए।
  • वर्तमान समय में किशोरों को गैजेट्स से नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जो बिना किसी सेंसर के उन पर अश्लील सामग्री देखने की लत सहित सभी प्रकार की जानकारी की बमबारी कर रहे हैं। अतः इससे निपटने के लिए जरूरी एवं सख्त कानूनी प्रावधानों की आवश्यकता है।
  • पोर्न देखने की लत, अन्य पदार्थों या ‘ चीजों ‘ की तरह ही है , जिनकी लोगों को लत लग सकती है, ‘ऑपरेंट कंडीशनिंग’ के सिद्धांतों के माध्यम से समझा जा सकता है और इसका समाधान किया जा सकता है।
  • इंटरनेट पर स्पष्ट यौन सामग्री की पहुंच के कारण किशोरों में पोर्न की बढ़ती लत चिंता का विषय बन रही है। एक अध्ययन के अनुसार आज 10 में से 09 नाबालिग लड़के किसी न किसी रूप में अश्लील सामग्री के संपर्क में हैं। वहीं, 10 में से छह लड़कियां पोर्नोग्राफी के संपर्क में आती हैं।
  • वर्तमान समय में भारत में 12-17 वर्ष की आयु के किशोर लड़कों में पोर्न की लत विकसित होने का खतरा सबसे अधिक है। औसतन, एक पुरुष का पहली बार पोर्नोग्राफ़ी से संपर्क 12 साल की उम्र में ही हो जाता है।
  • भारत में बच्चों द्वारा अश्लील सामग्री देखने के लिए बच्चों को दंडित करने के बजाय, समाज को इतना परिपक्व होना चाहिए कि वह उन्हें इस लत से छुटकारा दिलाने के लिए उचित सलाह, शिक्षा और परामर्श दे सके।

Download yojna daily current affairs hindi med 8th feb 2024

 

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

Q.1. भारत में बाल अश्लीलता के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए। 

  1. भारत में बाल अश्लीलता डाउनलोड करना अपराध की श्रेणी में नहीं आता है।
  2. IT ऐक्ट की धारा 67 A और 67 B ज़मानत योग्य होता  हैं। भारत में चाइल्ड पोर्नोग्राफी से जुड़े मामले में POCSO कानून के तहत कार्रवाई  नहीं होती है
  3. भारत में पास्को अधिनियम एक बच्चे को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है जो सोलह वर्ष  या सोलह वर्ष से कम आयु का है।
  4. भारत में पॉर्न बनाने, बेचने, शेयर करने, इसके प्रदर्शन आदि पर सख्त पाबंदी है।  इसके बावजूद भारत दुनिया का तीसरा सबसे अधिक पॉर्न देखने वाला देश है। 

उपरोक्त कथन / कथनों में से कौन सा कथन सही है ?

(A) केवल 1 और 3 

(B) केवल 2 और 4 

(C) केवल 3 

(D ) केवल 4 

उत्तर – (D) 

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

Q.1. बाल अश्लीलता से आप क्या समझते हैं ? चर्चा कीजिए कि सोशल मीडिया के बढ़ते प्रसार के दौर में भारत में बाल अश्लीलता की रोकथाम के लिए के बनाए गए कानून वर्तमान समय में कितना प्रासंगिक है ? बाल अश्लीलता की रोकथाम के लिए तर्कसंगत समाधान भी प्रस्तुत कीजिए।

 

No Comments

Post A Comment