संसदीय समितियाँ

संसदीय समितियाँ

संसदीय समितियाँ

संदर्भ- हाल ही में संसदीय समितियों में बदलाव से सरकार और विपक्षी दलों में संबंध खराब हो सकते हैं। कुल 22 समितियों में से केवल एक पद कांग्रेस के पास है। और दूसरे सबसे बड़े दल तृणमूल कांग्रेस के पास कोई पद नहीं है। सत्तारुढ़ पार्टी भाजपा के पास गृह, वित्त, आइटी , रक्षा और विदेश मामलों की महत्वपूर्ण समितियों की अध्यक्षता है।

संसदीय समितियाँ- संसदीय समिति सांसदों का एक पैनल होता है जिसे सदन द्वारा नियुक्त या निर्वाचित किया जाता है। अध्यक्ष को भी समिति को नामित करने का अधिकार होता है। यह समिति अध्यक्ष के निर्देशन मेंं कार्य करती है।

  • भारत में संसदीय समितियाँ मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधारों के अंतर्गत 1921 से अस्तित्व में आई।
  • संविधान में समितियों का उल्लेख अनुच्छेद 105 में दिया गया है। जो सांसदों के विशेषाधिकार से संबंधित है।
  • संसद के अधिकांश कार्य संसदीय समितियों द्वारा किए जाते हैं।
  • इसी प्रकार अनुच्छेद 118, संसद को अपनी प्रक्रिया के संचालन को विनियमित करने के लिए नियम बनाने का अधिकार देता है।

संसद की विभिन्न समितियाँ- प्रकृति के आधार पर संसदीय समितियाँ दो प्रकार की होती है- स्थायी समिति व तदर्थ समिति।

स्थायी समिति- स्थायी समिति का गठन समय समय पर संसद के अधिनियम अथवा लोकसभा के कार्य योजना के  3अनुसार किया जाता है। इन समितियों का कार्य अनवरत किस्म का होता है। जैसे वित्त समिति, स्थायी समिति व अन्य किसी समिति के अंतर्गत आते हैं। 1993 में बजटीय प्रस्तावों व सरकारी नीतियों की जांच के लिए शिवराज पाटिल की अध्यक्षता में स्थायी समितियाँ अस्तित्व में आई। 24 स्थायी समितियों में प्रत्येक समिति में 31 सदस्य होते हैं। जहां 21 सदस्य लोकसभा से और 10 राज्यसभा से संबंधित होंगे।

तदर्थ समिति- किसी विशिष्ट प्रयोजन हेतु नियुक्त की जाती हैं। जब वे अपना प्रयोजन या कार्य पूर्ण कर लेती है तब उनका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। जैसे संसद भवन परिसर में रेलवे कन्वेंशन समिति, खाद्य प्रबंध प्रवर समिति तथा राष्ट्रीय नेताओं व संसदविदों के चित्रों को लगाने से संबंधित समिति।

इन दो समितियों के अतिरिक्त संसद किसी विषय या विधेय की विस्तृत जांच के लिए दोनों सदनों के साथ मिलकर एक संयुक्त समिति का गठन भी कर सकती है। जेपीसी व प्रवर समितियों की अध्यक्षता आमतौर पर सत्ताधारी पार्टियों द्वारा की जाती है, और अपनी रिपोर्ट जमा करने के बाद उन्हें भंग कर दिया जाता है। 

समिति के अध्यक्ष- परंपरा के अनुसार समितियों के प्रमुखों की नियुक्ति के लिए पीएसी अध्यक्ष का पद विपक्षी दल को मिलता है। यह वर्तमान में कांग्रेस को दिया गया है। पैनल के प्रमुख अपनी बैठकें निर्धारित करते हैं। वे एजेंडा व वार्षिक रिपोर्ट तैयार करने में स्पष्ट भूमिका निभाते हैं। और समिति के कुशल प्रबंधन के हित में निर्णय लिए जा सकते हैं। अध्यक्ष बैठकों की अध्यक्षता करता है और यह तय करता है कि पैनल के समक्ष किसे बुलाया जाना चाहिए।   

संसदीय समितियों व संसद की चर्चा में अंतर

 

संसदीय चर्चा संसदीय समितियों की चर्चा
सदन में किसी विधेयक पर बोलने का समय पार्टी के आकार पर निर्भर करता है। समितियाँ आकार में छोटी होती हैं। समितियों मं प्रत्येक सदस्य को बोलने के समय पर कोई पाबंदी नहीं होती।
संसद में वर्ष में केवल 100 बैठक होती हैं। समितियाँ संसद के कैलेंडर से पूर्णतः मुक्त होती हैं।
संसद की कार्यवाही में सीधा प्रसारण होता है जिससे सांसद बेबाकी से अपनी बात नहीं कह पाते। समितियों की चर्चा गोपनीय होती हैं जिससे सदस्य अपने विचार आसानी से रख सकते हैं। अतः यह चर्चा वास्तविक होती है।

समितियों का कार्य-

  • समितियाँ कई मंत्रालयों के साथ मिलकर कार्य करती है, और अंतरमंत्रालयी समन्वय की सुविधा प्रदान करती है।
  • जिन विधेयकों को सदन में भेजा जाता है वे मूल्यवर्धन के साथ सदन में लौट आते हैं।
  • मंत्रालयों या विभागों की अनुदान मांगों की जांच करती है।
  • विधेयकों की वार्षिक रिपोर्ट तैयार कर दीर्घकालिक योजनाओं पर विचार करते हुए संसद को रिपोर्ट प्रस्तुत करती है।

समितियों की सिफारिशें- 

  • विभागीय रूप से संसदीय समितियों के प्रतिवेदन सिफारिशी प्रकृति के होते हैं।
  • वे सरकार पर हावी नहीं होते लेकिन महत्वपूर्ण होते हैै।
  • अब तक समितियों की सिफारिशों को सदन में स्वीकार कर विधेयक में शामिल कर लिया गया।
  • सरकार को समितियों को उनकी सिफारिशों के प्रत्युत्तर स्वरूप वापस रिपोर्ट करनी होगी कि क्या वास्तव में इन सिफारिशों को स्वीकार कर लिया गया है।
  • अंत में समितियां, सिफारिश पर सरकार की कार्यवाही पर अंतिम रिपोर्ट बनाती है। 

स्रोत-

https://indianexpress.com/article/explained/explained-politics/parliament-committees-and-their-role-in-law-making-8191768/

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